22 बरस के आदिवासी लड़के ने किया था अंग्रजों की नाक में दम, जानें कौन थे जननायक बिरसा मुंडा । Birsa Munda:-

भगवान बिरसा मुंडा जयंती पर विशेष

15 नवंबर भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को देशभर में जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। इस बार अमर शहीद बिरसा मुंडा की जयंती पर उनकी जन्मस्थली उलिहातू में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी शामिल होंगी।। जनजातीय गौरव दिवस पर खूंटी जिले के उलिहातू में आयोजित समारोह होने वाले समारोह को लेकर सारी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई है। उलिहातू में पहली बार किसी राष्ट्रपति का आगमन हो रहा हैं। हालांकि झारखंड की राज्यपाल के रूप में द्रौपदी मुर्मू पहले भी कई बार उलिहातू जा चुकी हैं।

गुरुवार के दिन जन्म होने के कारण नाम पड़ा बिरसा

चूंकि बिरसा मुंडा का जन्म गुरुवार यानी बृहस्पतिवार के दिन हुआ था, इसलिए मुंडा समुदाय के संस्कार के अनुसार उनका नाम बिरसा रखा गया। भारत सरकार ने 10 नवंबर 2021 को उनके जन्मदिन को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया था। उनकी तस्वीर भारत के संसदीय संग्रहालय में भी लगी है।

धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन झारखंड अपना स्थापना दिवस मनाता है. 15 नवंबर 2022 को झारखंड 22 साल का हो जाएगा और 23 साल में प्रवेश कर जाएगा. झारखंड अलग राज्य के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गयी. यह गवाह रहा है कि जब भी झारखंड की धरती पर जोर जुल्म हुआ है, यहां बड़ा उलगुलान हुआ है. बिरसा आंदोलन उसका जीता-जागता प्रमाण है. भगवान बिरसा मुंडा ने अपने कुछ अनुयायियों के साथ पारंपरिक हथियारों के साथ अंग्रेजों के गोली-बंदूक और तोप का सामना किया. धरती आबा बिरसा मुंडा के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हर कोई लेना चाहता है. हम यहां आपको उनके वंशजों के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं. प्रभातखबर डॉट कॉम की टीम खूंटी जिला के उलिहातू गांव पहुंची जहां बिरसा का जन्म हुआ था. वहां अब भी धरती आबा के वंशज रहते हैं.

उलिहातू में अब भी रहते हैं भगवान बिरसा मुंडा के वंशज

उलिहातू में भगवान बिरसा मुंडा के वंशज अब भी रहते हैं. इस समय उनके पौत्र और उनका पूरा परिवार उलिहातू में एक छोटे से मकान में रहता है. बिरसा ने जिस मकान में जन्म लिया था, उसे जन्मस्थली के रूप पर्यटक स्थल के रूप में आज विकसित कर दिया गया है, लेकिन उसके ठीक बगल में उनके वंशज जिस घर में रहते हैं, आज भी कच्चा मकान है. उन्हें अबतक पक्के घर नहीं मिल पाये हैं

भगवान बिरसा मुंडा की वंशावली

धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की वंशावली की बात करें तो, उलिहातू में उनका पांचवां पुश्त रह रहा है. बिरसा की वंशावली में सबसे पहला नाम लकरी मुंडा का नाम आता है. लकरी मुंडा के पुत्र हुए सुगना मुंडा और पसना मुंडा हुए. उसके बाद सुगना मुंडा के तीन पुत्र हुए, एक कोन्ता मुंडा, बिरसा भगवान और कानु मुंडा. कोन्ता और भगवान बिरसा के कोई पुत्र नहीं हुए और उनका वंश उनके भाई कानु मुंडा से चला. कानु के एक पुत्र हुए मोंगल मुंडा, जिनके दो पुत्र सुखराम मुंडा और बुधराम मुंडा. बुधराम के एक पुत्र हुए रवि मुंडा और उसके बाद उनका वंश वहीं खत्म हो गया. दूसरी ओर सुखराम मुंडा के चार पुत्र मोंगल मुंडा, जंगल सिंह मुंडा, कानु मुंडा और राम मुंडा. कानु मुंडा के दो पुत्र हैं, बिरसा मुंडा और नारायण मुंडा

बिरसा मुंडा से बिरसा डेविड बनते हैं

बिरसा मुंडा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हातू था। बिरसा का बचपन एक गांव से दूसरे गांव की यात्रा में बीता था। जर्मन स्कूल में दाखिला लेने की वजह से उन्होंने अपना नाम बदलकर बिरसा डेविड कर लिया था।

पढ़ाई के दौरान ही बिरसा मुंडा आदिवासियों की जमीन और वन संबंधी अधिकारों की मांग को लेकर सरदार आंदोलन में शामिल होते हैं। उस वक्त ईसाई धर्म के प्रचारक आदिवासियों से कहते थे कि यदि उनके उपदेशों का पालन किया ताे महाजनों ने जो जमीन छीनी है वो वापस मिल जाएगी। उन दिनों जर्मन लूथरन और रोमन कैथोलिक ईसाई किसानों का भूमि आंदोलन चल रहा था। इन ईसाई किसानों को सरदार कहा जाता था।

दरअसल, झारखंड में आने के बाद अंग्रेजी हुकूमत यहां के विद्रोह करने वाले आदिवासियों की जमीन छीन लेती थी। प्रवचनों में इन्हीं छीनी गई जमीनों को वापस दिलाने के वादे से आकर्षित होकर काफी संख्या में लोग ईसाई बन गए। लेकिन जब बिरसा को लगा कि ये लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ है तो वह ईसाई धर्म से दूर होने लगे।

15 साल की उम्र में बिरसा ने तंज कसते हुए कहा था कि ‘साहेब साहेब एक टोपी है’। यानी ईसाई मिशनरी जो धर्मांतरण में लगी है और अंग्रेज जो जमींदारों के साथ मिलकर उनके जमीन और जंगल को छीन रहे हैं, वे दोनों एक ही हैं। दोनों का लक्ष्य दमन के जरिए धर्मिक पहचान को छीनना है। इसके बाद ही वह ईसाई धर्म काे त्याग देते हैं और फिर बिरसा मुंडा बन जाते हैं।

उलिहातु में आकर्षक साज-सज्जा

उलिहातू में राष्ट्रपति के आगमन को लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए है। उलिहातू से लगभग दो किमी पूर्व राष्ट्रपति का हेलीकॉप्टर लैंड करेगा। हेलीपैड से लेकर बिरसा ओड़ा (भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली) तक आकर्षक ढंग से साज सज्जा की गई है। खूंटी में आजादी के बाद किसी राष्ट्रपति का यह पहला दौरा है। राष्ट्रपति के स्वागत में कोई कमी न रह जाये। प्रशासन इसको लेकर पूरी तरह मुस्तैद है। राष्ट्रपति सुबह 9 बजकर 5 मिनट में बिरसा के जन्मस्थल बिरसा ओड़ा पहुंचेगीं, वहां वे महान स्वतंत्रता सेनानी को नमन करेंगी। इस दौरान वे बिरसा मुंडा के वंशजों से भी मुलाकात करेंगी।

इतिहास में दर्ज होगा आज का बेहद खास दिन:पहली बार भगवान बिरसा की जन्मस्थली पहुंच रहा है कोई राष्ट्रपति, परिजनों के लिए ला रहीं है खास उपहार ।

पहली बार है, जब देश के राष्ट्रपति भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर श्रद्धांजलि देने भगवान बिरसा के गांव उलिहातू आ रहे हैं। आज का दिन बेहद खास है। झारखंड ने अलग राज्य के लिए आज की तारीख चुनी थी। 15 नवंबर साल 2000 को झारखंड अलग हुआ। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के साथ राज्य स्थापना दिवस का जश्न भी मनाया रहा है। इस जश्न को और खास बना रहा है राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का झारखंड दौरा।

राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार झारखंड आ रही हैं द्रौपदी मुर्मू

राष्ट्रपति बनने के बाद द्रौपदी मुर्मू पहली बार झारखंड आ रही हैं। राज्यपाल के तौर पर उनका इस राज्य से गहरा रिश्ता रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को इस राज्य की पहली महिला राज्यपाल होने का गौरव प्राप्त है। द्रौपदी मुर्मू का झारखंड में छह साल एक माह अठारह दिनों का कार्यकाल रहा। वे इस दाैरान विवादों से बेहद दूर रहीं। बतौर कुलाधिपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने कार्यकाल में झारखंड के विश्वविद्यालयों के लिए चांसलर पोर्टल शुरू कराया। विश्वविद्यालयों के कॉलेजों के लिए एक साथ छात्रों का ऑनलाइन नामांकन शुरू कराया। विश्वविद्यालयों में यह नया और पहला प्रयास था। राज्य राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम ऐसे कई बेहतरीन फैसले दर्ज हैं। झारखंड आने का मुख्य उद्देश्य है भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि अर्पित करना। इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति के साथ राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी होंगे।

इस तरह झारखंड व आदिवासियों के नायक बन गए

झारखंड के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश आदि आदिवासी बहुल राज्यों में भगवान बिरसा मुंडा को लोग सबसे बड़े क्रांतिकारी के रूप में जानते हैं। अंग्रज शासक उनके नाम से थर्रा उठते थे। जब उनका जन्म हुआ तब उलिहातु गांव रांची, झारखंड का हिस्सा हुआ करता था। झारखंड अगल राज्य की स्थापना के बाद वह झारखंड के ब्रांड बन गए। हर जगह यहां बिरसा मुंडा के नाम पर धरोहर देख सकते हैं। उनकी कई यादों को झारखंड सरकार ने सहेज रखा है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं।

15 नवंबर का अवकाश घोषित, बंद रहेंगे सभी स्कूल-कॉलेज और सरकारी कार्यालय

मध्यप्रदेश में 15 नवंबर को सभी सरकारी दफ्तरों में अवकाश घोषित किया गया है। इस दिन बिरसा मुंडा की जयंती  है। राज्य सरकार ने इस दिन का सामान्य अवकाश घोषित किया है। इससे पहले एच्छिक अवकाश हुआ करता था। इस प्रकार मध्यप्रदेश के सरकारी दफ्तरों, स्कूल और कॉलेजों में 15 नवंबर का अवकाश रहेगा। राज्य सरकार ने सरकारी छुट्टी का नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया था।

15 नवंबर को मध्यप्रदेश में बिरसा मुंडा की जयंती के मौके पर सामान्य अवकाश  घोषित किया गया है। इस दौरान सभी सरकारी दफ्तरों में और स्कूल-कालेजों में अवकाश रहेगा। पहले यह अवकाश सरकारी कैलेंडर में नहीं दी गई थी। जिसके बाद कैलेंडर में भी सुधारने के आदेश जारी किए गए थे। अब आनलाइन सरकारी कैलेंडर में भी संशोधन कर दिया गया है। सरकारी कोषालयों और उपकोषालयों में यह अवकाश नहीं रहेगा। इसके अलावा प्रदेश के सरकारी दफ्तरों में फाइव डे वीक काम होता है। इसलिए दो शनिवार और दो रविवार की छुट्टी बाकी है। जबकि कुछ स्कूलों में 14 नवंबर चिल्ड्रन्स-डे की भी छुट्टी है।
इससे पहले 15 नवंबर की बिरसा मुंडा जयंती का अवकाश घोषित होने के बावजूद सरकारी कैलेंडर में इसे नहीं दिखाया गया था। इससे शासकीय कर्मचारियों में भ्रम की स्थिति बन रही थी। अब कैलेंडर में सामान्य अवकाश घोषित होने के बाद 15 नवंबर को भी अवकाश रहेगा

 

जानिए कौन हैं बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा को लोग कई नामों से पुकारते हैं। उन्हें धरती बाबा, महानायक और भगवान भी माना जाता है। यह नाम ऐसे ही उन्हें नहीं मिले। अंतिम सांस तक अंग्रेजों से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले और प्रकृति को भगवान की तरह पूजने वाले बिरसा मुंडा का जन्म 14 नवंबर 1875 में झारखंड के खूंटी जिले में हुआ था। आदिवासी इन्हें अपना महानायक मानते हैं। आदिवासी परिवार में जन्मे बिरसा के पिता सुगना पूर्ती और मां करमी पूर्ती निषाद जाति से तालुल्क रखते थे। बिरसा का पूरा जीवन आदिवासियों को उनके अधिकारों के लिए जागरूक करने और आदिवासियों के हित के लिए अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए बीता। अपनी हार से गुस्साए अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा को जहर दे दिया था। 9 जून 1900 को रांची कारागार में उन्होंने अंतिम सांस ली। रांची के डिस्टलरी पुल के पास बिरसा मुंडा की समाधि बनी है। मध्यप्रदेश में भी आदिवासी इलाकों में बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूजा जाता है। केंद्र सरकार ने 15 नवंबर को इनकी जयंती के मौके पर जनजातीय गौरव दिवस मनाने का फैसला लिया था।

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